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भौतिक विज्ञान (प्रमुख तथ्य)

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-भौतिक शास्त्र विज्ञान की वह शाखा है जिसमें वस्तुओं के भौतिक गुणों ऊर्जाओं का अध्ययन किया जाता है।

-किसी वस्तु की चाल (Speed) इकाई समय में वस्तु द्वारा तय की गई दूरी है। यह एक अदिश राशी होती है।

-किसी वस्तु का वेग वस्तु द्वारा इकाई समय में निश्चित दिशा तय की गई दूरी है। यह सदिश राशी है।

-किसी वस्तु का वेग निर्धारण के लिए वेग दूरी/(समय) सूत्र का उपयोग किया जाता है।

-समय के साथ किसी वस्तु के वेग परिवर्तन की दर को उस वस्तु का त्वरण कहते हैं।


-न्यूटन के प्रथम गति नियम से जड़ता के सिद्धान्त का बोध होता है।

-न्यूटन के द्वितीय गति नियम से बल मापने का सूत्र ज्ञात होता है।

-जब किसी वस्तु में उसके वेग के कारण जो गुण पाया जाता है उसे उस वस्त का संवेग कहते हैं।

-न्यूटन के तृतीय गति नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

-बल वह भौतिक कारण है जो किसी वस्तु की अवस्था को बदल दे अथवा बदलने की चेष्टा करे।

-जिस बल के कारण दो वस्तुएँ एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, उसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं।

-किसी पिंड पर पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल उस पिंड पर पृथ्वी का गुरुत्व बल कहलाता है।

-जब एक वस्तु को दूसरी वस्तु की सतह पर रखकर खिसकाने का प्रयास किया जाता है तो उसे रोकने के लिए हमेशा एक बल उत्पन्न होता है उसे घर्षण कहते हैं। घर्षण बल हमेशा गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है।

-पृथ्वी के ध्रुवों पर गुरुत्वीय त्वरण g का मान महत्तम और विषुवत रेखा पर न्यूनतम होता है।

-दो पदार्थों के बीच लगने वाला आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है। यह नियम न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का नियम कहलाता है।

-केप्लर के ग्रहीय गति नियम के अनुसार, ग्रह की गति दीर्घ वृत्तीय कक्षाओं में होती है।

-गुरुत्वीय नियतांक G का मान 6.673×10-11 Nm2 Kg2 होता है।

-चन्द्रमा पर किसी वस्तु का भार पृथ्वी पर उसके भार का 1/6 गुना होता है।

-किसी पिंड का गुरूत्व केन्द्र उसका वह बिन्दु होता है जिससे होकर उस पिंड का सारा भार कार्य करता है।

-किसी दृढ़ पिंड पर कार्य करने वाले दो बराबर और विपरीत समानान्तर बलों को बल-युग्म कहते हैं।

-पृथ्वी की सतह पर से किसी वस्तु का पलायन वेग का मान 11.6 किलोमीटर से० होता है।

-किसी वस्तु के कार्य करने की क्षमता को उस वस्तु की ऊर्जा कहते हैं। कार्य/समय

-इलेक्ट्रानवोल्ट (ev) ऊर्जा का मात्रक है तथा 1 ev = 1-6×10-19 जूल

-किसी वस्तु के कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं, अर्थात् शक्ति का मात्रक जूल/से० है, इसे वाट भी कहा जाता है।

-1 अश्व शक्ति (Horse Power) = 746 वाट ।

-आपेक्षित के सिद्धान्त का प्रतिपादन आइंस्टीन नामक वैज्ञानिक ने किया

-वस्तु के उस गुण को प्रत्यास्थता कहा जाता है जिसके कारण वह बल हटाए जाने पर अपनी मूल स्थिति में आ जाती है।

-दूव का वह गुण जिसके कारण इसका मुक्त पृष्ठ तानित कला के रूप में कार्य करता है, इसे पृष्ठ तनाव कहते हैं।

-किसी वस्तु में गति के कारण पाई जाने वाली ऊर्जा ½mv2 है तथा स्थिति के कारण पाई जाने वाली ऊर्जा mgh है।

-किसी माध्यम में विक्षोभ (disturbance) के संचरण को तरंग (Wave) कहते हैं।

-ध्वनि-तरंग के संचरण के लिए द्रव्यात्मक माध्यम आवश्यक है।

-ध्वनि-तरंगों की चाल 330 मीटर/सेकण्ड होती है।

-तरंग दैधर्य (Wave length) की इकाई मीटर होती है। 1 ऐंगेस्ट्रम = 10-10मीटर

-ध्वनि निर्वात (Vaccum) में गमन नहीं करती है।

-ध्वनि तरंग का वेग ठोस में अधिकतम तथा गैसों में न्यूनतम होता है।

-ध्वनि का वेग ताप बढ़ने से बढ़ता है।

-मनुष्य के मस्तिष्क में सुनी गई किसी ध्वनि का प्रभाव लगभग 1/10 से० तक रहता है।

-मानव कान के श्रवण की सीमा (Limits of audibility) 20 Hz से 20,000 Hz के बीच होती है।

-प्रतिध्वनि सुनने के लिए ध्वनि स्रोत से परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी 16.6 मीटर होती है।

-उष्मा ठंडे पदार्थ से गर्म पदार्थ में नहीं जाती बल्कि गर्म पदार्थ से ठंडे पदार्थ में

-किसी वस्तु की उष्मा जिस यंत्र द्वारा मापा जाता है उसे थर्मामीटर कहते हैं।

-सेल्सियस, फारेनहाइट तथा केल्विन नामक पैमाने पर उष्मा को मापा जाता है।

-मानव शरीर का ताप सामान्यतः 98:6°F या 37°C होता है।

-(-273)°C ताप को परम शून्य ताप कहा जाता है।

-वह तापमान (-273°C) जिस पर गैस का आयतन और दाब शून्य हो जाता है परम शून्य तापमान कहलाता है।

-एक ग्राम पदार्थ के ताप को 1°C तक बढ़ाने के लिए आवश्यक उष्मा को उस पदार्थ की विशिष्ट उष्मा कहते हैं अथत् Q= mst.

-किसी वस्तु का ताप 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक उष्मा को उस वस्तु की उष्मा धारिता कहते हैं।

-जल का घनत्व 4°C पर महत्तम होता है।

-दाब बढ़ने पर (जिन पदार्थों का आयतन गलने पर बढ़ता है) उनका गलनांक दाब बढ़ता है।

-दाब के बढ़ने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ता है।

-प्रकाश के प्रकीर्णन (Scattering of Light) के कारण आकाश का रंग नीला दिखाई देता है।

-प्रकाशिकी में u,v एवं f के बीच सम्बंध होता है : = 1/f = 1/u + 1/v

-निकट दृष्टि (Short Sight) वाली आँख दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकती। इस दोष को अवतल लेंस द्वारा दूर किया जाता है।

-दूर दृष्टि वाली आँख निकट की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकती। इस दोष को उत्तल लेंस द्वारा दूर किया जाता है।

-फोटोग्राफिक कैमरे में उत्तल लेंस का उपयोग किया जाता है।

-श्वेत प्रकाश या सूर्य का प्रकाश सात रंगों या वर्गों से मिलकर बना है।

-बैगनी रंग के प्रकाश का तरंग दैर्घ्य न्यूनतम होता है।

-लाल रंग के प्रकाश का तरंग दैर्ध्य अधिकतम होता है।

-लाल, हरा तथा नीला रंग को प्राथमिक वर्ण (Primary Colours) कहा जाता है। पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के कारण हीरे में चमक होती है।

-हीरे का अपवर्तनांक अधिक होने के कारण इसमें पूर्ण आन्तरिक परावर्तन घटना होती है।

-मृग मरीचिका (mirage) की घटनां पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के कारण होती है।

-प्रकाश के तरंग सिद्धांत का प्रतिपादन न्यूटन ने किया।

-आकाश में तारों का टिमटिमाना प्रकाश के अपवर्तन के कारण होता है।

-आकाश में इन्द्रधनुष (Rainbow) वर्ण-विक्षेपण के कारण बनता है।

-श्वेत प्रकाश में बैगनी रंग का विचलन महत्तम तथा लाल रंग का न्यूनतम होता है।

-सूक्ष्मदर्शी (Microscope) द्वारा छोटी वस्तु को बड़े आकार में देखा जाता है।

-दूरदर्शी (Telescope) द्वारा दूर की वस्तु को देखा जाता है।

-लेंस की शक्ति का मान डाइऑप्टर में मापा जाता है। ।

-किसी सेल में रासायनिक ऊर्जा का रूपांतर विद्युत ऊर्जा में होता है।

-विद्युत शक्ति का S. I मात्रक वाट है।

-एकांक धन आवेश को अनन्त से किसी बिन्दु पर लाने में किए गये कार्य को उस बिन्दु पर वस्तु का विभव कहते हैं। इसका S.I. मात्रक वोल्ट है।

-एकांक धन आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक लाने में किए गये कार्य को उन दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर कहते हैं।

-विभवान्तर के अधीन आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहा जाता है। विद्युत धारा किसी चालक या परिपथ में इलेक्ट्रॉन का प्रवाह है। इसका S.I. मात्रकं एम्पियर होता है।

-जब किसी चालक अथवा विद्युत परिपथ में विद्युत धारा बहती है तो कोई कारक इस धारा को बहने से रोकता है जिसे प्रतिरोध कहा जाता है। इसका S.I. मात्रक ओम होता है।

-जिस यंत्र द्वारा किस विद्युत परिपथ में प्रवाहित धारा मापी जाती है उसे एमा कहा जाता है। एमीटर को हमेशा परिपथ में श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है।

-जिस यंत्र द्वारा विभवान्तर मापा जाता है उसे वोल्टमीटर कहते हैं। वोल्टमा को विद्युत परिपथ में हमेशा समानान्तर क्रम में जोड़ा जाता है।

-निश्चित तापक्रम पर किसी चालक में प्रवाहित होने वाली धारा उसके दोनो के बीच के विभवान्तर का समानुपाती होता है। यह ओम का नियम कहलाता है।

-वह पदार्थ जिसका प्रतिरोध चालक और अचालक पदार्थों के बीच होता है वह अर्द्धचालक (Semi-Conductor) कहलाता है।

-ताप बढ़ने से अर्धचालक पदार्थों का प्रतिरोध घटता है।

-जर्मेनियम तथा सिलिकन अर्द्धचालक के उदाहरण हैं।

-अतिचालकता ऐसी धातु अथवा वस्तुओं के संयोग से जनित भौतिक गुण है जो विद्युत् प्रवाह में किसी प्रकार का प्रतिरोध उत्पन्न न करे ।

-सेल (Cell) में रासायनिक उर्जा का रूपांतरपा विद्युत् उर्जा में होता है।

-सरल सेल में ताब की प्लेट धन ध्रुव तथा जस्ते की प्लेट ऋण ध्रुव का कार्य करता है।

-विद्युत ऊर्जा का व्यापारिक माप किलोवाट घंटा (KWH) में किया जाता है।

-विद्युत बल्ब में टग्सटन नामक धातु के तंत (Filament) का उपयोग होता है। योकि टंग्सटन का विशिष्ट प्रतिरोध तथा गलनांक दोनों उच्च होते हैं।

-विद्युत ताप युक्तियों में नाइक्रोम के तार की कंडली का व्यावहार होता है।

-बल्ब में निष्क्रिय गैस (Inert Gas) भरी जाती है।

-1 किलोवाट घंटा = 3.6X 106 जूल होता है।

-डायनेमो एक ऐसा विद्युत यंत्र है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।

-विद्युत शक्ति का संचरण (Transmission) हमेशा उच्च विभवान्तर पर किया जाता है।

-घरेलू कार्यों के लिए विद्युत शक्ति 220 वोल्ट पर दी जाती है।

-विद्युत मोटर की क्रिया धारा पर चुम्बकीय प्रभाव पर आधारित होती है। । ट्रांस्फॉर्मर का काम धारा के विभव को बढ़ाना अथवा घटाना होता है।

-सूर्य में विशाल ऊर्जा नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) द्वारा प्राप्त होता है।

-चुम्बक में दो ध्रुव होते हैं–उतरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव । चुम्बक के किसी ध्रुव का को उससे अलग नहीं किया जा सकता है। उसके ध्रुव को पीट-पीट कर नष्ट
किया जा सकता है।

-स्थायी चुम्बक बनाने के लिए इस्पात का उपयोग किया जाता है।

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